DMRC पहली बार ‘सिंगल पिलर तकनीक’ के इस्तेमाल से कर रही है मेट्रो के फेज-4 के एलिवेटेड स्टेशनों का निर्माण

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नई दिल्ली: मेट्रो के फेज-4 की एलिवेटेड लाइनों और उन पर बन रहे मेट्रो स्टेशनों के निर्माण के लिए डीएमआरसी पहली बार ‘सिंगल पिलर तकनीक’ का इस्तेमाल कर रही है।

निर्माण कार्य के दौरान साइट के आस-पास ट्रैफिक ज्यादा प्रभावित ना हो, उसी को ध्यान में रखते हुए इस तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है।

इसमें सड़क पर बेहद कम जगह घेरनी पड़ती है और ज्यादातर काम साइट पर नहीं, बल्कि यार्ड में ही हो जाता है। यह तकनीक सुरक्षा के लिहाज से भी ज्यादा उन्नत और बेहतर

मानी जाती है।डीएमआरसी के अधिकारियों ने बताया है कि फेज-4 के 3 कॉरिडोर्स पर बनने वाले 45 नए मेट्रो स्टेशनों में से 27 स्टेशन एलिवेटेड होंगे।

उनमें से अभी 16 एलिवेटेड स्टेशनों और उनको आपस में जोड़ने वाली मेट्रो लाइनों पर इसी तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है।

दिल्ली में पहली बार एक साथ इतनी बड़ी संख्या में सिंगल पिलर्स पर नए मेट्रो स्टेशनों और मेट्रो कॉरिडोर्स का निर्माण किया जा रहा है।

इस तकनीक में केवल वायाडक्ट ही नहीं, बल्कि स्टेशन का पूरा ढांचा भी इन्हीं पिलर्स के ऊपर खड़ा किया जा सकता है।

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ये फर्क है नई और पुरानी तकनीक में: पुरानी तकनीक में जहां पिलर के ऊपरी हिस्से में पिलर कैप लगाने के बाद उसके ऊपर वायाडक्ट लगाना पड़ता था, वहीं इस तकनीक में सीधे पिलर के ऊपर ही वायाडक्ट लगा दिया

जाता है, यानी पिलर और वायाडक्ट के बीच में अलग से कोई और जोड़ नहीं होता है। फेज-1 और 2 में अपनाई गई पारंपरिक तकनीक में स्टेशन के ढांचे को सहारा देने के लिए

सड़क के किनारे दोनों तरफ अतिरिक्त पिलर्स खड़े करने पड़ते थे, जिससे ज्यादा जगह घिरती थी और ट्रैफिक भी ज्यादा प्रभावित होता था।

नई तकनीक में सड़क के बीचोंबीच खड़े किए गए सिंगल पिलर्स के ऊपर ही स्टेशन का पूरा ढांचा खड़ा किया जा सकता है। इसके लिए पिलर के सबसे ऊपरी हिस्से में ज्यादा लंबी बीम लगाई जाती है,

जो कोनकोर्स और प्लेटफॉर्म, दोनों के ढांचे को दोनों तरफ से सहारा देने में सक्षम होती है और उसमें पर्याप्त वजन सहन करने की क्षमता होती है।

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पुराने पिलर्स के मुकाबले नई तकनीक में इस्तेमाल किए गए पिलर्स देखने में भले ही थोड़े पतले लगते हों, लेकिन ये होते काफी मजबूत हैं

साइट पर नहीं करना पड़ता ज्यादा काम: इस तकनीक की एक और खूबी यह है कि इसमें कंस्ट्रक्शन साइट पर ज्यादा काम करने की जरूरत नहीं पड़ती है। इसमें कोनकोर्स और प्लेटफॉर्म के अलग-अलग हिस्सों को

कंस्ट्रक्शन यार्ड में अलग से तैयार कर लिया जाता है। जब पिलर बनाने और उस पर बीम रखने का काम पूरा हो जाता है, तो रात में ट्रैफिक कम होने पर स्टेशन के इन अलग-अलग

हिस्सों को एक-एक करके यार्ड से कंस्ट्रक्शन साइट पर लाकर उन्हें क्रेन के जरिए स्टेशन में लगा दिया जाता है। पुरानी तकनीक में कोनकोर्स और प्लेटफॉर्म के सभी हिस्सों का

निर्माण कंस्ट्रक्शन साइट पर ही करना पड़ता था, जिसके कारण न केवल साइट पर ज्यादा मजदूर और मशीनरी लगानी पड़ती थी, बल्कि वहां पर काम भी ज्यादा समय तक करना

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पड़ता था और इस वजह से सुरक्षा को लेकर हमेशा चिंता बनी रहती थी। अब ज्यादातर काम यार्ड में ही अत्यंत सुरक्षित तरीके से हो जाता है।

दिल्ली में पहली इस्तेमाल की जाएगी यह तकनीक: डीएमआरसी के प्रिंसिपल एग्जिक्यूटिव डायरेक्ट अनुज दयाल के मुताबिक, एक और खास बात यह है कि डीएमआरसी ने दिल्ली में ही नहीं, बल्कि गाजियाबाद में सबसे पहले इस

तकनीक का इस्तेमाल किया था। फेज-3 में रेड लाइन पर शहीद स्थल से दिलशाद गार्डन के बीच इसी तकनीक का इस्तेमाल करके मेट्रो कॉरिडोर और स्टेशनों का निर्माण किया

फेज-4 में ये स्टेशन बन रहे हैं सिंगल पिलर पर
•मजेंटा लाइन (जनकपुरी वेस्ट-आरके आश्रम मार्ग कॉरिडोर पर)

गया था, लेकिन दिल्ली में डीएमआरसी पहली बार फेज-4 के दौरान इस तकनीक का इस्तेमाल कर रही है।

•केशोपुर, पश्चिम विहार, मंगोलपुरी, वेस्ट एनक्लेव, पुष्पांजलि, दीपाली चौक, प्रशांत विहार, नॉर्थ पीतमपुरा और भलस्वा।

•पिंक लाइन (मौजपुर-मजलिस पार्क कॉरिडोर पर)
यमुना विहार, भजनपुरा, खजूरी खास, सोनिया विहार, जगतपुर विलेज, झड़ौदा माजरा और बुराड़ी।